राजस्थान की संत परंपरा में राग एवं ताल का अप्रचलित स्वरूप
| Author(s) | |
|---|---|
| Country | INDIA |
| Research Area | MUSIC |
| Published In | Volume 1, Issue 2 (November-December 2026) |
| Published On | 5 November 2026 |
| Paper Id | IJMRDS-1080 |
Abstract
समृद्ध ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विरासत से जुड़ी है। यहाँ की भक्ति परंपरा को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है: सगुण परंपरा (मूर्ति पूजा और साकार रूप में ईश्वर की उपासना) और निर्गुण परंपरा (निराकार ईश्वर की उपासना)। [1] लोकगीत राजस्थान की लोक संस्कृति की आत्मा हैं ये गीत सामान्य जन की बोलचाल की भाषा में गाए जाते हैं लोकगीतों में मानवीय भावनाएं, प्रेम, विरह, श्रम, प्रकृति और भक्ति का चित्रण होता है इनका गायन राजसी दरबारों त्योहारों सामाजिक अवसरों दैनिक जीवन के कार्यों के समय किया जाता है लोकगीत की परिभाषाएं और विचार लोकगीत मानव मन में उत्पन्न भावों की संगीतमय अभिव्यक्ति है रामचंद्र शुक्ल हमारी संस्कृति लोकगीतों के कंधों पर टिकी है महात्मा गांधी लोकगीत हमारी संस्कृति के रक्षक हैं रवीन्द्रनाथ टैगोर लोकगीत संस्कृति में सुखद संदेश लाने की कला हैं जवाहरलाल नेहरू लोकगीत जन समुदाय की आत्मा हैं देवेंद्र सत्यार्थी लोकगीत किसी संस्कृति के मुख बोले चित्र होते हैं
Keywords: राजस्थान , संत परंपरा , आध्यात्मिक विरासत , राग एवं ताल , समृद्ध ऐतिहासिक
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