हिंदी साहित्य में मातृत्व और स्त्री संवेदना
| Author(s) | |
|---|---|
| Country | INDIA |
| Research Area | HINDI LITERATURE |
| Published In | Volume 1, Issue 1 (September-October 2026) |
| Published On | 24 September 2026 |
| Pages | 1-7 |
| Paper Id | IJMRDS-1010 |
Abstract
हिंदी साहित्य में मातृत्व और स्त्री संवेदना स्त्री के आत्मसम्मान, संघर्ष और ममता के पारंपरिक रूपों से आगे बढ़कर उसकी स्वतंत्र पहचान और यथार्थ को दर्ज करने का एक संवेदनशील माध्यम रहा है। [1, 2] हिंदी साहित्य में स्त्री संवेदना का स्वरूप • पारंपरिक से आधुनिक दृष्टि: प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य में स्त्री को मुख्य रूप से त्याग, ममता और सहिष्णुता की मूर्ति के रूप में देखा गया। आधुनिक काल और विशेषकर छायावाद के बाद महादेवी वर्मा जैसे रचनाकारों ने स्त्री की वेदना और मुक्ति के प्रश्नों को प्रमुखता दी। [1, 2] • पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध: समकालीन महिला और पुरुष साहित्यकारों ने समाज की रूढ़ियों, असमानता और पितृसत्तात्मक सोच पर खुलकर सवाल उठाए हैं। [1, 2, 3] • स्वाभिमान और अधिकार: अब स्त्री संवेदना केवल करुणा या पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्त्री के हक, आत्मसम्मान, और उसके अपने निर्णयों की अभिव्यक्ति बन चुकी है। [1, 2, 3] मातृत्व की बदलती अवधारणा • ममता की चादर से आगे देह और यथार्थ: साहित्य में अब मातृत्व को केवल एक महिमामंडित और त्यागपूर्ण भावना के रूप में नहीं, बल्कि प्रसव की शारीरिक पीड़ा, मानसिक स्वास्थ्य और कामकाजी माँ के संघर्षों के यथार्थ के साथ देखा जाने लगा है। [1] • वैकल्पिक और आधुनिक मातृत्व: समकालीन विमर्श में सिंगल मदर, सरोगेसी और आधुनिक जीवनशैली के बीच माँ की बदलती भूमिका और उसकी अपनी पहचान (अस्मिता) के द्वंद्व को गहराई से उकेरा जा रहा है। [1]
Keywords: हिंदी, साहित्य, मातृत्व , स्त्री, संवेदना
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